आखिरी मॉनसून फूल

आखिरी मॉनसून फूल

आखिरी मॉनसून फूल

बूढ़ी औरत खिड़की के पास बैठी थी, उसकी निगाहें बाहर बरसती मॉनसून की बारिश पर टिकी थीं. हर बूँद एक याद समेटे हुए थी, जैसे वह टूटे हुए शीशे पर बहकर, उसके धुँधले संसार को और भी धुँधला कर रही हो. राधा ने अपने नब्बे सालों में कई मॉनसून देखे थे, पर यह कुछ अलग था. यह ठंडा था, जून के हिसाब से भी, और यह ठंड सिर्फ उसकी हड्डियों में नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व के हर कोने में समा रही थी.

उसकी उंगलियाँ, गांठदार और कमज़ोर, खिड़की पर रखी एक छोटी सी तसवीर के फ्रेम पर फिर रही थीं. एक जवान आदमी, उसकी मुस्कान चमकीली और ज़िंदगी से भरपूर, उसे देख रहा था. उसका बेटा, अनिल. उस दुर्घटना को बीस साल हो गए थे, बीस साल जब बाढ़ के पानी ने उसे, और उनकी छोटी सी, नदी किनारे की झोपड़ी को निगल लिया था. जो कुछ भी उनके पास था, जो कुछ भी उन्होंने बनाया था, एक ही विनाशकारी रात में बह गया था.

उसे उस दिन की अनिल की खुशी याद थी. वह अपनी छोटी सी गेंदे के फूलों की क्यारी में काम कर रहा था, एक धुन गुनगुना रहा था जो अब उसे याद नहीं थी. "माँ," उसने पुकारा था, उसकी आवाज़ युवा आशावाद से भरी थी, "इस साल, फसल बहुत अच्छी होगी! हम आखिरकार छत ठीक करवा लेंगे, और आपको एक और सर्दी में नहीं कांपना पड़ेगा."

लेकिन अनिल के लिए सर्दी कभी नहीं आई. नदी, जो आमतौर पर एक परोपकारी प्रदाता थी, एक गरजते हुए जानवर में बदल गई थी. राधा एक पेड़ से चिपकी हुई थी, बेबसी से देखती रही जब धारा उसके बेटे को बहा ले गई, उसका फैला हुआ हाथ धीरे-धीरे उफनते भूरे पानी के नीचे गायब हो गया.

अब, सिर्फ तसवीर बची थी, एक अधूरे जीवन का एक नाजुक प्रमाण. उसके बाद वह शहर चली गई थी, एक छोटे से किराए के कमरे में, दूर के रिश्तेदारों की मदद एक कड़वी गोली थी. व्यस्त सड़कें, लगातार बजते हॉर्न, उदासीन चेहरे – इनमें से कोई भी उस खालीपन को नहीं भर सका था जो अनिल छोड़ गया था.

बारिश तेज़ हो गई, जस्ती लोहे की छत पर एक उदास ताल बजाती हुई. राधा ने आँखें बंद कर लीं, अनिल का चेहरा याद करने की कोशिश कर रही थी, उसकी हँसी को फिर से महसूस करने की कोशिश कर रही थी. लेकिन तस्वीर फीकी पड़ रही थी, जैसे ज़्यादा धूप में रखी पुरानी तसवीर. उसकी यादें, जो कभी जीवंत और तेज़ थीं, अब धुंधली थीं, एक लंबे समय से खोई हुई खुशी के टुकड़े.

एक अकेला, नाजुक गेंदे का फूल, शायद हवा द्वारा लाए गए बीज का अवशेष, किसी तरह उसकी खिड़की के नीचे कंक्रीट की दरारों में उग आया था. उसकी पंखुड़ियाँ, भूरे रंग के खिलाफ एक जीवंत नारंगी, बारिश में कांपती हुई लग रही थी. राधा उसे देखती रही, एक आँसू उसकी गालों की झुर्रियों से होकर बह रहा था. यह एक खूबसूरत, अवज्ञाकारी चीज़ थी, सभी बाधाओं के बावजूद खिल रही थी. लेकिन इसकी सुंदरता भी दुख की एक नई लहर ले आई. यह एक ऐसा फूल था जो अकेला खिलता था, ठीक उसकी तरह. और जल्द ही, वह जानती थी, यह भी मुरझा जाएगा.

Post a Comment

Previous Post Next Post